तमाशा

इतने मशरूफ हैं हम गम-ए-ज़माने में
की ये उलझी ज़ुल्फ़ें सवारने का वक़्त कहाँ हैं ?

मंज़िल की ललक में सफर तय किए जा रहें हैं
की दिल को रह-ए-सन्नाटे की खबर कहाँ हैं ?

वक़्त निकाल कर मिला करते थे जिन दोस्तों को
आज उनसे मिलने की फुरसत भी कहाँ हैं ?

बहुत कुछ गवाया है मैंने दुनिया के जलसों में
पर बैठ कर उसकी गिनती करने का वक़्त कहाँ हैं ?

वो तो कल रात की बारिश ने हमें थमने पर मजबूर कर दिया
नहीं तो वक़्त निकाल कर, बिते वक़्त को याद करने का वक़्त कहाँ हैं ?

– नैंसी

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